Friday, January 9, 2009




तन-मन-धन व्यय किया, किया न गुरु से हेत
कर पान गुरुसबद सुधा, आतम कहे “अब चेत”


‘गुरु-गुरु’ तो जग रटें, गुरु को माने सब
गुरुजी मन में बिचार रहें, ‘गुरु की मानेगा कब?

II जंतर-मंतर II

जंतर सच है, मंतर भी सच, सच है दुनियादारी
तन-मन-धन सच, घन सच ऋण सच, सच है माया सारी

सच को सच से सच में मथ कर, सच ही में खोजें राम
ज्यों लोहा लोहे से कटे, काम ही से कटे है काम

काम = मुक्ति की कामना
काम = भोग की कामना

ll त्याग ll
तन को प्रिय ‘काम’ है, मन को ‘द्वेष’ औ ‘राग’
जन तो रचै ‘अभिमान’ में, ठोर न पावें ‘त्याग’

II कष्ट II
सुख ही सुख में रचा-पचा, हरि से हेत न होए
कष्ट-कुंजी का जोर पड़े, तब मन-किवाड़ बिसरोए

II अमरपुर II


मन समुद्र अति भीषण, फिर भंवरों का खेल

नीचे बनकर माया पंक, खींचे इच्छा की बेल

इस समुद्र के पार है जो, जगत अति मधुर
उसी तट पर होगा संगम, वहीँ है अमरपुर

भव के इस भवसागर में जब, मिले कोई खिवैया
अपनी गठरी छोड़ के बंधू, चढ़ जाना वो नैया

बार बार न आवे हंसा, न होवे मिलन मधुर
जमपूरी में बीतें बरसों, अब चलें अमरपुर

II सच्चा साथी II
सच्चा साथी एक ही, जनम से अपने संग
प्रीत निभाएं उस प्रीतम की, रंगें उसी के रंग

आठों पहर सेवा करे, न जात पूछें न पांत
जनम से तार जोर दे, जब तक पड़े न जम की लात

जान लो अपने साथी को, "साँस" है उसका नाम
तीन लोक की सम्पदा, न ही मोल सकें न दाम

सुरति लगाओ प्रेम जगाओ, देखो एकटक साँस
ना जाने किस साँस में, है अपने राम का वास

II तत्व II

शरीर साधन तो सब करे, मन करे बिरला कोए

दोनों तज जो तत्व रमे, उन्मुक्त हंसा सो होए

सतगुरु भी इक नाई है

सतगुरु भी इक नाई है, काटें दुःख के डोर
शब्द के औजार से, गिरावें मन के चोर
विषय बेल लिपट के, भरम की गांठ बड़ जाए
मिलिए सतगुरु बार बार, नाई सों काट गिराए
तीखा अस्तर शीष पर, आंख मूंद कर सोये
यूँ समर्पण कर गुरु को, संशय करे सों रोये

ज्यों अस्तर शीष धरें, आसन होए थीर
आसन से मत डोलो, ये मन-जल अति गभीर
थोड़ा सहेज थोड़ा घाव कर, नाई निखारे रूप
वही रित अपनाकर सतगुरु, दिखावे आत्म स्वरुप

माया और मन
माया और मन दोनों ही, पुरूष के बस न आये
मुरख माया साधत है, इक मन साधे सब सध जाए

आसन बदले माला बदले, बदले जनेऊ औ धोती
मन-मानुस को जो न बदले, छुटे न करम-बपौती

सुख-दुःख


सुख-दुःख उतना ही मांगिये, जो पाचन होई जाए

अति सुख अति दुःख दोनों ही, तन और मन को खाए
सुख के पीछे दुःख चले, दुःख के पीछे सुख
बंधकर के इस घोर में, मिटे न मन की भूख
सुख में हरि साधन करें, तजी भोग-विकार
कष्ट काल की वेला में, मन नही पावै हार

गुरु पूर्णिमा
ये नैनन क्यों भेद करे, तुम और वो दोउ एक
चमड़ी की थाह चमड़ी तक, दिखावें रूप अनेक


संबंध
बहुत संबंध बनाईया, बहु दीनी ताके नाम
प्रेम-जतन से राखिया, कभी न कभी पड़े काम

एक संबंध ऐसो भयो, जाको न ओर न छोर
कौन नाम इस को रखूँ, बुद्धि न पावे ठोर

नाम नाम में क्या रखा है, नाम बेचन सब खाये
अखंड-अनामी जो बतावे, वही “संबंध” कहलाये

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